
सूर्योदय भारत समाचार सेवा, बरेली : बरेली आदर्श फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर की गई जाँच में सामने आया है कि यह आंदोलन गंभीर बकाया भुगतान, वित्तीय अनियमितताओं और संगठन व उसके नेतृत्व के खिलाफ लंबित कानूनी मामलों से ध्यान हटाने की कोशिश हो सकता है।
विरोध के दौरान किसानों के शोषण के जो दावे किए जा रहे हैं, वे रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते। जाँच से जुड़े दस्तावेज़ों के अनुसार, बरेली आदर्श एफपीओ के डायरेक्टर्स और सीईओ खुद जाँच के दायरे में हैं। उन पर किसानों और अन्य फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस को भुगतान न करने के आरोप हैं, जिनसे माल की खरीद की गई थी।
पीवाईके फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने 50 लाख रुपए के भुगतान न होने को लेकर बरेली आदर्श एफपीओ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। इस एफआईआर में एफपीओ के साथ उसके सीईओ श्री हरीश गंगवार का नाम भी शामिल है।
इसके अलावा, बदायूं जिले के किसानों ने भी बरेली आदर्श एफपीओ के खिलाफ पुलिस में शिकायतें दर्ज कराई हैं। शिकायतों में कहा गया है कि किसानों ने माल की आपूर्ति की, लेकिन बार-बार संपर्क करने के बावजूद उन्हें भुगतान नहीं मिला।
बसई गाँव के निवासी, रामवीर के पुत्र अंकित शर्मा ने कहा, “हमें एफपीओ पर भरोसा था, क्योंकि इसे किसानों की संस्था बताकर पेश किया गया था। माल देने के बाद हम महीने-दर-महीने संपर्क करते रहे, लेकिन न तो कोई जवाब मिला, न कोई स्पष्टता और न ही भुगतान। हमने धैर्य रखा, लेकिन जब कुछ नहीं हुआ, तो हमें मजबूरन प्रशासन के पास जाना पड़ा।”
इटौआ गाँव के रहने वाले, सुखपाल सिंह के पुत्र राम नरेश ने बरेली आदर्श फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन को 100 क्विंटल माल सप्लाई किया था। उन्होंने भी इसी तरह की बात कही। उन्होंने बताया कि भुगतान की बारी आते ही एफपीओ की ओर से हर तरह का सहयोग पूरी तरह बंद हो गया।
उन्होंने कहा, “माल की आपूर्ति करने के बाद एफपीओ की ओर से कोई संपर्क नहीं रहा। न कोई मदद मिली, न कोई जवाब और न ही कोई सफाई। बरेली आदर्श एफपीओ ने हमें धोखा दिया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।”
इन शिकायतों और पहले से दर्ज एफआईआर के बावजूद, बरेली आदर्श एफपीओ और उसके प्रतिनिधि बरेली स्थित एक गोदाम में किए गए विरोध प्रदर्शन के जरिए खुद को सार्वजनिक रूप से पीड़ित के रूप में पेश कर रहे हैं। हालाँकि, आधिकारिक रिकॉर्ड और मंडी प्रशासन से मिले इनपुट इस दावे से मेल नहीं खाते।
दस्तावेज़ों से पता चलता है कि औपचारिक नोटिस जारी होने के बावजूद अनिवार्य मंडी टैक्स का भुगतान नहीं किया गया। बीज निगम को देय गोदाम किराया भी लंबे समय तक लंबित रहा, जिसे बाद में संचालन में बाधा न आए, इसके लिए एक तीसरे पक्ष द्वारा चुकाया गया। मामले से जुड़े अधिकारियों ने पुष्टि की कि गोदाम को बिना अनुमति के 20 दिनों से अधिक समय तक बंद रखा गया, जिससे पहुँच बाधित हुई और एनबीएफसी की कानूनी रूप से अनिवार्य कार्यवाही प्रभावित हुई। इसके बाद लैब रिपोर्ट में भंडारित माल की गुणवत्ता में गिरावट की पुष्टि हुई।
यह मामला फिलहाल कानूनी समीक्षा के अधीन है और इससे जुड़ी कई कार्यवाहियाँ वर्तमान में चल रही हैं।
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