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धर्मेंद्र को बहुत पसंद थी श्रीगंगानगर की “रेवाड़ी बर्फी”

अमित नागपाल, श्रीगंगानगर (राजस्थान) : धरम जी चले गये! पीछे छोड़ गये अपनी अनेकानेक खूबसूरत फ़िल्मों का ख़ज़ाना! और छोड़ गये, अपने प्रशंसकों के दिलों में बसी ख़ुशनुमा यादें, जो सारी ज़िंदगी उनके साथ रहेंगी! धरम जी से मेरा 2 बार मिलना हुआ। पहली बार शायद 2009 में, जब मैं सिर्फ़ 2 दिन के लिए मुंबई गया था, काफ़ी सालों बाद! गंगानगर के मूल निवासी और फ़िल्म एक्टर/प्रोड्यूसर/डायरेक्टर रहे योगेश छाबड़ा अंकल को रिक्वेस्ट किया कि मुझे धरम जी से मिलना है। योगेश अंकल ने एक फ़ोन किया, और मुझे और मेरे साथी को शाम को उनके घर ले गये ! मैं गंगानगर से रेवाड़ी बर्फ़ी का एक डिब्बा ले गया था उनके लिए। पापा ने बताया था कि धरम जी को यह बर्फ़ी बहुत पसंद है। पापा जब उस से भी कुछ साल पहले, अपने जिगरी दोस्त, डॉ. अरुण सोफ़्ता अंकल (श्रीकरणपुर के मूल निवासी और पिछले अनेक दशकों से अमेरिका में सेटल्ड) और योगेश अंकल के मार्फ़त मुंबई में धर्मेंद्र देओल परिवार के मेहमान बने थे, तब भी वे उनके लिए रेवाड़ी बर्फ़ी ले गये थे जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी। उसके बाद जब पापा को गले का कैंसर हुआ और एक सर्जरी के बाद उनकी आवाज़ चली गई, योगेश अंकल ने मुंबई से फ़ोन पर उनसे धरम जी की बात करवाई। पापा लिख कर अपनी बात कहते रहे, जिसे छोटा भाई गौरव पढ़ कर, धरम जी को बताता रहा ! धरम जी पापा को हौसला देने के अलावा, तब भी बोले, “कमल, जो बर्फ़ी तूने मुझे खिलाई थी, वो बहुत बढ़िया थी, मुझे एक डिब्बा भिजवाना ! पापा ने तब 4 डिब्बे भिजवाए धरम जी के लिए !

ख़ैर ! जब मैं पहली बार उनके घर गया, धरम जी अपने बड़े से ड्राइंग रूम में अपने दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे। जब उस कमरे में दाखिल हुए तो हम चकाचौंध से हो गये! क़रीब 10/15 दोस्त होंगे उनके, जिनमें कई फ़िल्मों के कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थे। धरम जी के भाई, स्वर्गीय अजीत देओल (अभय देओल के पापा) भी कुर्ता-लुंगी पहन कर बैठे थे। धरम जी ने बड़े प्यार से मुलाक़ात की और सबसे परिचय करवाया। फिर धरम जी ने एक या दो पीस बर्फ़ी के ख़ुद खाये और बाक़ी डिब्बा अपने दोस्तों को खाने को दे दिया ! 5 मिनट से भी कम टाइम में डिब्बा निपट गया। मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैं एक ही डिब्बा लेकर क्यों आया उनके लिए ! धरम जी ने सबसे कहा भी, कि यह रेवाड़ी बर्फ़ी ज़रूर है, मगर आयी गंगानगर से है ! सबको बहुत पसंद आयी वह बर्फ़ी !

उसके क़रीब 5 साल बाद फिर सपरिवार मुंबई जाना हुआ। इस बार फिर योगेश छाबड़ा अंकल के साथ धरम जी के घर उनसे मिलने गये। मैं, वाइफ रैना, बेटे देवांश और कुशाग्र, सबसे बड़े प्यार से उन्होंने मुलाक़ात की। इस बार फिर उनकी पसंदीदा बर्फ़ी ले गया था। जब धरम जी को मैंने “प्रताप केसरी” समाचार पत्र की कॉपी दी, वे बड़े चाव से उसे पढ़ने लगे! गंगानगर और राजनीति के बारे में भी चर्चा की।

अब धरम जी इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उनके जैसा हैंडसम, टैलेंटेड एक्टर, और उस से भी बढ़ कर “सोने के दिल वाला” इंसान शायद नहीं मिलने वाला ! भगवान उनकी आत्मा को शांति दें और समस्त देओल परिवार और उनके चाहने वालों को यह सदीवी विछोड़ा सहन करने का बल दें ! ॐ शान्ति।

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