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बीबीएयू में ‘अंतरिक्ष और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए उच्च तापमान सामग्री पर आविष्कार, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास’ विषय पर हुआ कार्यक्रम का आयोजन

सूर्योदय भारत समाचार सेवा, लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में सोमवार 25 अगस्त को संस्थान नवाचार परिषद की ओर से ‘अंतरिक्ष और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए उच्च तापमान सामग्री पर आविष्कार, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं वक्ता के तौर पर सीएसआईआर – सेंट्रल इलेक्ट्रो केमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, कारिकुडी, तमिलनाडु के सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. जी. श्रीधर मौजूद रहे। इसके अतिरिक्त मुख्य तौर पर आईआईसी, बीबीएयू के चैयरपर्सन प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा, जैव प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. डी.आर. मोदी, प्रो. राम चन्द्रा एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ. जी. सुनील बाबू उपस्थित रहे।

सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. जी. श्रीधर ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार आज देश में विज्ञान और तकनीक का तेजी से विकास हो रहा है उसका असर सीधे हमारे अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि इसरो के रॉकेट इंजनों में अब खास सेंसर लगाए जा रहे हैं, जो इंजन के अंदर प्रेशर और फ्यूल के बहाव को जांचते हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलती है कि रॉकेट सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। इस तकनीक से रॉकेट को और सुरक्षित और भरोसेमंद बनाया जा सकता है। इन्होंने बताया कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की ‘प्रलय’ मिसाइल, जो 150 से 500 किलोमीटर तक के निशाने को भेद सकती है, हाल ही में सफलतापूर्वक टेस्ट की गई है और इससे भारत की रक्षा क्षमता और भी मजबूत हुई है।

इसी के साथ डॉ. श्रीधर ने और भी कई महत्वपूर्ण तकनीकों पर प्रकाश डाला जैसे कि हाई टेम्परेचर कोरोजन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उन जगहों पर होता है जहाँ बहुत ज्यादा गर्मी होती है, जैसे पावर प्लांट और इंजन, ताकि मशीनें लंबे समय तक चल सकें। इसी तरह मोल्टन सॉल्ट इलेक्ट्रोलिसिस एक ऐसी तकनीक है जिससे धातुओं और दूसरे कीमती पदार्थों को शुद्ध किया जाता है। उन्होंने थर्मल बैरियर कोटिंग्स के बारे में भी बताया, जो मिसाइल और इंजन को ज्यादा गर्मी से बचाती हैं।

डॉ. नवीन कुमार अरोड़ा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आविष्कार और नवाचार ही किसी भी देश की असली ताकत होते हैं। नया सोचने और नई चीजें बनाने से ही विज्ञान और तकनीक आगे बढ़ते हैं।

अंत में डॉ. जी. सुनील बाबू ने धन्यवाद ज्ञापित किया। समस्त कार्यक्रम के दौरान प्रो. संगीता सक्सेना, प्रो. वेंकटेश कुमार, प्रो. एन.के.एस. मोरे, डॉ. रामनरेश भार्गव, अन्य शिक्षकगण, गैर शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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