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रोज एक सूर्य निगल रहा है ये ब्लैकहोल, धरती के सूर्य पर भी कर सकता है जल्द हमला

ब्रह्मांड के रहस्यों से अब तक कोई नहीं समझ पाया है। चांद, तारे, सूर्य, ग्रह, आकाशगंगा और न जाने क्या-क्या इतना कुछ है जो इंसान को समझना बाकी है। बहुत कुछ इंसान से समझने की कोशिश की है लेकिन वो भी अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।

ऐसा ही एक रहस्य है ब्लैकहोल का रहस्य। ब्रह्मांड में एक ऐसा भी ब्लैकहोल है जो विशाल सूर्य को भी निगल जाता है। ये ब्लैकहोल सूर्य का 3400 करोड़ गुना है। हैरान करने वाली बात ये हैं कि ये ब्लैकहोल जे2157 एक ही महीने में दोगुने आकार का हो जाता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ये ब्लैकहोल ब्रह्मांड के सबसे बड़े ब्लैकहोल एबेल 85 से थोड़ा ही छोटा है लेकिन इसका वजन 4,000 करोड़ सूर्य के बराबर है। ब्लैकहोल को लेकर हुए ऑस्ट्रेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी के एक नए शोध पता चला है कि मिल्की वे का ये ब्लैकहोल अगर इसी तेजी से बढ़ता रहा तो ये आकाशगंगा के दो तिहाई तारों को यूंही निगल जाएगा।

ये स्टडी के अनुसार, एक ब्लैकहोल कितने सूर्य या तारों को निगल जाएगा ये इस पर निर्भर है कि वो कितना बड़ा हो चुका है। मिल्की वे का ये ब्लैकहोल पहले ही बहुत बड़ा हो चुका है। ये इतना बड़ा हो गया है कि ये हर 10 लाख साल में 1% बढ़ जाता है।

वैज्ञानिक बताते हैं कि ये ब्लैकहोल ब्रह्मांड का सबसे चमकदार ब्लैकहोल है। इसकी खोज करने वाले वैज्ञानिक क्रिश्चियन वुल्फ का कहना है कि ये जितनी तेजी से बढ़ रहा है,उतनी ही तेजी के साथ ये हजार गुना अधिक तेजी से चमकदार होता जा रहा है।

इसकी वजह है इस ब्लैक होल का रोजाना अपने भीतर बनने वाली गैसों को अपने अंदर समा लेना या पी लेना। गैसों को पी जाने से ही इसमें ऊर्जा और घर्षण पैदा होता है, इसलिए ये काफी चमकदार होता जाता है।

मरते तारों से लगाया अनुमान
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मरते हुए तारों की प्रक्रिया का यदि अध्ययन किया जाए तो ब्लैकहोल के वजन का पता लगाया जा सकता है। इसी के आधार पर जापान के भौतिकी के शोधकर्ताओं ने ब्लैकहोल के बनने और उसके अधिकतम वजन का पता लगाया है।

लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल वेब ऑब्जर्वेटरी (लिगो) और विर्गो इंटरफेरोमीट्रिक ग्रैविटेशनल वेब एंटीना (विर्गो) के जरिये गुरुत्वीय तरंगों का ज्ञान मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने जाना कि जीडब्ल्यू 170729 नाम के ब्लैकहोल में और तारों के निगले जाने से पहले ही यह करीब 50 सूर्य के वजन (भार) के बराबर है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये एक ब्लैकहोल में समा जाता है, जिससे सुपरनोवा विस्फोट होता है।

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