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मोदी सरकार का साहसिक कदम – नई शिक्षा नीति 2020

  • सतीश साह


आखिरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के द्वारा भारत में बहुप्रतीक्षित नई शिक्षा नीति 2020 को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कर दिया गया है और शीघ्र ही इसे लागू करने की दिशा में भी सरकार आगे बढ़ेगी। प्रारंभिक रूप से इस नई शिक्षा नीति में कई बड़े और व्यापक बदलाव किये गये हैं। पहली बार वर्ष 1986 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के द्वारा शिक्षा नीति बनाई गई थी और 34 वर्ष बाद पुनः इसमें मोदी सरकार द्वारा व्यापक बदलाव के साथ लागू करने की योजना है। 
वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा अपने घोषणा पत्र में नई शिक्षा नीति को लाने का उल्लेख किया गया था, किंतु 6 वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद आखिरकार इसका प्रस्ताव देश के सामने आ चुका है। वर्ष 2015 में सरकार द्वारा पूर्व कैबिनेट सचिव टी.आर.एस सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई थी, कमेटी द्वारा अध्ययन के आधार पर नई शिक्षा नीति का मसौदा भी पेश किया गया था किंतु किसी कारण अनुकूल नहीं पाया गया और अगले ही वर्ष 2016 में अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंजन की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया गया और इस समिति ने 31 मई 2019 को केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को नई शिक्षा नीति की विस्तृत ड्राफ्ट रिपोर्ट सौंप दी।  नई शिक्षा नीति के अंतर्गत उच्च शिक्षा में किये गये बदलाव से बच्चों को काफी राहत मिलने की संभावना है। उच्च शिक्षा में मल्टीपल एण्ट्री और एक्जिट की सुविधा प्रदान की गई है, जिसमें उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों को कभी भी अपनी पसंद और नापसंद के हिसाब से विषय और कोर्स को अपनी रूचि के हिसाब से बदलने की छूट होगी। उदाहरण के तौर पर यदि आप बी.ई. या बी.टेक को छोड़कर अपनी रूचि के किसी अन्य विषय को पढ़ना चाहते हैं तो संस्थान आपको उस समय तक की गई पढ़ाई के आधार पर प्रमाण पत्र देगा जिससे आपका वर्ष भी खराब नहीं होगा और आपके इस प्रमाण पत्र, डिप्लोमा या डिग्री के आधार पर क्रेडिट ट्रांसफर की सुविधा दूसरे संस्थान और दूसरे पाठक्रम में काउंट करने की व्यवस्था होगी ।
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत अनुसंधान (रिसर्च) पर ज्यादा जोर दिया गया है। नौकरी के लिहाज से पढ़ाई कर रहे छात्रों को पृथक वरीयता और अनुसंधान के लिये पृथक वरीयता प्रदान की जायेगी। भारत में अब तक छात्रों के लिये रिसर्च में रूचि बढ़ाने का कोई खास विकल्प नहीं होता था, किंतु नई शिक्षा नीति के अंतर्गत रिसर्च को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है जो भविष्य की संभावनाओं के आधार पर काफी अच्छी पहल है। रिसर्च के क्षेत्र में अमेरिका के तर्ज पर भारत भी नई शिक्षा नीति के अंतर्गत नैशनल रीसर्च फ़ाउंडेशन की स्थापना पर विचार कर रहा है। जिससे विज्ञान संकाय के अलावा अन्य संकायो के छात्रों को भी रिसर्च करने की सुविधा प्रदान की जायेगी। सरकार का यह फैसला शिक्षा जगत में भारत को सुपर पावर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।  नई शिक्षा नीति के अंतर्गत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक और बड़ा बदलाव किया गया है जिसमें एक विश्वविद्यालय के अंतर्गत कई कॉलेजों को मान्यता प्राप्त होती है। पूर्व में सभी कॉलेजों में विभिन्न परीक्षाओं का आयोजन या निर्धारण मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय द्वारा किया जाता था किंतु अब नई शिक्षा नीति के माध्यम से कॉलेजों को भी परीक्षायें आयोजित करने की स्वायत्ता होगी। 
सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में एकल रेगुलेटर की व्यवस्था भी की गई है ताकि शिक्षा का मानक एक जैसा हो, चाहे वह केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो, राज्य के विश्वविद्यालय हो या डीम्ड विश्वविद्यालय। सिंगल रेगुलेटर सिस्टम की व्यवस्था के बाद अब निजी कॉलेज और विश्वविद्यालयों द्वारा मनमाफिक फीस वसूल नहीं की जा सकेगी। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत फी-कैप (फीस का निर्धारण) की भी व्यवस्था की गई है। शिक्षा नीति के अंतर्गत तकनीकी शिक्षा पर भी काफी जोर दिया गया है और वर्चुअल लैब्स के माध्यम से उच्च शिक्षा में छात्रों को एक व्यापक संभावनायें उपलब्ध कराने पर विचार किया जा रहा है। 
नई शिक्षा नीति के माध्यम से स्कूली शिक्षा में भी व्यापक बदलाव किये गये हैं। वर्तमान में हमारे यहां 10+2 की स्कूली शिक्षा व्यवस्था है, जिसमें दसवीं कक्षा तक छात्रों को सभी अनिवार्य विषय लेने की बाध्यता है और ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्रों को उनकी रूचि और मेरिट के आधार पर चार संकायों में आगे की शिक्षा दी जाने की व्यवस्था है, जिसमें मुख्य रूप से फिजिक्स, बायोलॉजी, आर्ट्स (कला) और कॉमर्स (वाणिज्य) है। किंतु, नई शिक्षा नीति के आने से स्कूली शिक्षा में 3 से 6 वर्ष के बच्चों को खेलकूद के माध्यम से पढ़ाने की व्यवस्था की जायेगी ताकि बिना किसी मानसिक दबाव के बच्चे खेलते-कूदते हुए पढ़ाई के प्रति अपनी रूचि को विकसित कर सकें। 6 से 9 वर्ष के बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देने पर जोर है ताकि वे बेसिक चीजों को पढ़ और लिख सकें। 
नई शिक्षा नीति के माध्यम से सरकार द्वारा छात्र-छात्राओं को छोटी उम्र में ही विभिन्न प्रकार की वोकेशनल ट्रेनिंग प्रदान करने पर जोर दिया जा रहा है जो स्वागत योग्य कदम है। यह ट्रेनिंग बच्चों को श्रम-शक्ति में बेसिक कुशलता प्रदान करने की दिशा में काफी अच्छा कदम है। ऐसे छात्रों को कारपेन्टर, लाउन्ड्री, लोहार, दुकानदार आदि श्रम-शक्ति से जुड़े वोकेशनल और बेसिक ट्रेनिंग को शिक्षा का एक हिस्सा बनाये जाने की योजना है। पूर्व में भी कृषि को अनिवार्य रूप से स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की मांग की जाती रही है ताकि छात्र-छात्राओं को कृषि के क्षेत्र में कार्य करने में रूचि पैदा की जा सके। 
नई नीति में 9वी से 12वी तक छात्रों के पाठक्रम में एकरूपता रहेगी । इसमें अब विज्ञान के छात्र को यदि इतिहास, अर्थशास्त्र या कोई अन्य विषय जैसे म्यूज़िक आदि को भी अपने रूचि के अनुसार पढ़ने का मौक़ा मिलेगा और वह विषय भी दूसरे विषयों की तरह ही अनिवार्य विषय माना जाएगा । यह व्यवस्था छात्र को अपने प्रतिभा को निखारने में सहयोग करेगा जैसे कोई छात्र विज्ञान संकाय से पढ़ रहा हैं किंतु संगीत में भी उसकी रूचि हैं तो वह संगीत को भी अपना अनिवार्य विषय के रूप में ले सकता हैं । बोर्ड की परीक्षा वर्ष में 2 बार आयोजित करने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें वस्तुपूरक प्रश्नों के माध्यम से भी बोर्ड परीक्षाओं को आयोजित किया जाना है। इसमें छात्रों की अंकसूची या रिपोर्ट कार्ड में छात्र के शिक्षक के अलावा स्वयं छात्र को भी अपना मूल्यांकन करने का कॉलम होगा। इसके अलावा उसके सहपाठी को भी मूल्यांकन करने का अवसर दिया जायेगा। 
नई शिक्षा नीति 2020 में सरकार का विदेशी विश्वविद्यालयों को भी भारत में निमंत्रण देने की योजना हैं । ऐसे प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत सरकार सभी प्रकार की समुचित व्यवस्था प्रदान करेगी ताकि वे यहाँ अपना कैम्पस खोल सके और इसके पीछे का बड़ा कारण हैं कि भारत से प्रतिभा पलायन पर रोक लगाई जा सके ।  लेकिन, सवाल यह उठता हैं कि विश्व की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी भी भारत में ही है – नालंदा यूनिवर्सिटी । इसके अलावा भी कई ऐसे केंद्रीय और राज्य के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में हैं जिनके पढ़े हुए छात्र-छात्राओं ने पूरे विश्व में भारत का डंका बजाया है। ज़रूरत है, उन विश्वविद्यालयों की चरमराती व्यवस्था और जूझते शिक्षकों की कमी से उबारने का । यदि हमारे देसी यूनिवर्सिटी की व्यवस्था भी आधुनिक और इंटरनेशनल स्टैंडर्ड को पूरा करेगी तो क्यों होगा प्रतिभाओं का पलायन?
इसके अलावा भी कई व्यापक बदलाव किये गये हैं और प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान समय की मांग के अनुरूप ही सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति को स्वीकृत किया गया है। किंतु कुछ प्रश्न अब भी है जिसमें मजबूती प्रदान किये बिना नई शिक्षा नीति 2020 को लागू करने के उपरांत भी धरातल पर इसकी प्रासंगिकता को बनाये रखना संभव नहीं है। इस नई शिक्षा नीति को लागू करने के बाद केन्द्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों को भी एक साथ आना पडे़गा, तभी इस शिक्षा नीति को अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाया जा सकता है। इस देश में शिक्षा कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया, अब इस देश के युवाओं और लोगों को शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों को मुद्दा बनाना पड़ेगा। उन्हें अपनी राज्य सरकारों को नई शिक्षा नीति में किये गये बदलावों और उपायों को अपनाने को विवश करना पड़ेगा। 
देश भर के शासकीय स्कूल और कॉलेज लगातार शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। अपनी व्यवस्थाओं को लेकर हमेशा सवालों के घेरे में खड़े शासकीय स्कूलों को फिर से शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त प्रतिस्पर्धा के दौर में खुद को पुनः बेहतर साबित करने की चुनौती होगी। शासकीय स्कूलों और सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों को सुदृढ़ करने की मांग की जानी चाहिए। देश की आजादी के बाद लगभग सभी बड़े अधिकारी, राजनेता, वैज्ञानिक और प्रबुद्धजन आदि सभी की प्रारंभिक शिक्षा गांवों और कस्बों के शासकीय स्कूलों में ही पूरी हुई है। किंतु लगातार व्याप्त कमियाँ और बदइंतजामी के कारण इन संस्थानों की साख और व्यवस्था दोनों धराशायी हो गई और इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। 
हमारे देश में देश के नौनिहालों के भविष्य को बनाने वाले हमारे गुरूजनों और शिक्षकों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। बिना शिक्षक या गुरू के बेहतर शिक्षण व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की सकती। वर्तमान में देशव्यापी कोरोना महामारी के कारण निजी विद्यालयों और कॉलेज के शिक्षकों को पिछले कई महीनों से वेतन नहीं मिल पा रहा है। सरकार को यह भी चाहिये कि ऐसे संस्थानों के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्था की जाये ताकि उन शिक्षकों को वेतन मिल सके, जिनके ऊपर इस देश के भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी है।
कोरोना महामारी से प्रभावित भारत में पिछले कई महीनों से स्कूल बंद हैं । निजी और कुछ शासकीय स्कूलों द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की जा रही हैं । किंतु, आर्थिक रूप से तंग परिवार में अपने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा हेतु ऐंड्रॉड मोबाइल फ़ोन या लैप्टॉप उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। जो सरकारें चुनाव के समय स्मार्ट फ़ोन देने का वादा किए थे उन्होंने भी चुनाव जीतने के बाद कुछ विशेष रूचि लेते नहीं दिख रहे हैं अन्यथा ऐसे समय में आर्थिक रूप से कमजोर छात्र-छात्राओं के ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्ट फ़ोन सर्वाधिक उपयोगी होता । वर्तमान भारत में भी पूरी जनसंख्या में 90 प्रतिशत लोगों के पास ही मोबाइल है और उनमें भी मात्र 40 प्रतिशत लोगों के पास ही फ़ीचर फ़ोन उपलब्ध हैं । 
पिछले दिनों उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा बोर्ड परीक्षाओं का परिणाम घोषित किया गया और उस परिणाम में हिंदी विषय में लगभग 8 लाख से अधिक छात्र फेल हो गए । हिंदी के प्रति हिंदी भाषी प्रदेशों में ही इतनी उदासीनता व्याप्त है, क्यों?  
नई शिक्षा नीति 2020 को स्वीकार करना बेशक सरकार के साहसिक कदम को परिलक्षित करता है, किंतु इसे लागू करने के बाद सरकार के स्तर पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर जिला स्तर पर इस नीति को शत-प्रतिशत परस्पर निगरानी की व्यवस्था की जानी चाहिए। ताकि इस नीति के माध्यम से समाज के अंतिम और उपेक्षित छात्र-छात्राओं को भी बेहतर अवसर प्रदान किये जा सके, अन्यथा प्रशासन के भरोसे न तो पूर्व की शिक्षा नीति पर ध्यान दिया जाता रहा है और न ही नई शिक्षा नीति को लागू करने में उनकी कोई रूचि होगी ?

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