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पशुओं में लंपी स्किन बीमारी का उचित देखभाल और प्रबंधन से हो सकता है निदान : डॉ कुमार मंगलम यादव, मंगलम पेट्स क्लीनिक

सूर्योदय भारत समाचार सेवा लखनऊ, लखनऊ। लंपी वायरस का कहर देश के कई राज्यों में फैलता जा रहा है. यह एक तरह की स्किन की बीमारी (Skin Disease) है, लंपी स्किन डिजीज के प्रमुख लक्षण पशु को बुखार आना,वजन कम हो जाना ,आंखों से पानी टपकना,लार बहना,शरीर पर दाने जैसे उभार या गांठे निकलना,दूध कम देना और भूख नहीं लगाना है.इसके साथ ही उसका शरीर दिन प्रतिदिन और खराब होते जाना है, यह वायरस बहुत तेजी से पशुओं को संक्रमित कर रहा है एलएसडी एक संक्रामक रोग है, जिसमें पशुओं में बुखार और स्किन में गांठदार या ढेलेदार दाने बन जाते हैं. इसे एलएसडीवी कहते हैं. यह संक्रमण पशु से अन्य दूसरे पशुओं में फैलता है. यह कैप्रीपॉक्स वायरस के कारण ही फैलता है.यह बीमारी संक्रमित मच्छरों, मक्खियों, जूं और अन्य कीटों के सीधे संपर्क में आने से फैलती है। दूषित भोजन-पानी और हवा के माध्यम से भी यह संक्रमण फैलता है। कमजोर इम्‍यूनिटी वाली गायों को खासतौर पर यह वायरस प्रभावित करता है. इस रोग का कोई ठोस इलाज न होने के चलते सिर्फ वैक्‍सीन के द्वारा ही इस रोग पर नियंत्रण और रोकथाम की जा सकती है. हालांकि इसके लक्षण प्रमुखता इस प्रकार है ,इस बीमारी से ग्रसित पशुओं को बुखार आता है। इससे पशु सुस्त रहने लगता है।इस रोग से पीडि़त पशु की आंखों और नाक से स्राव होता है। पशु के मुंह से लार टकती रहती है। इस बीमारी से ग्रसित पशु के शरीर पर गांठ जैसे छाले हो जाते हैं जो फफेले का रूप ले लेते हैं। इससे पशु को काफी परेशानी होती है।इस रोग से ग्रसित पशु की दूध देने की क्षमता कम हो जाती है। इससे पशुपालक को हानि होती है।रोग से ग्रसित की भूख कम हो जाती है और पशु चारा कम खाना शुरू कर देता है।उपरोक्त लक्षण दिखाई देने बाद संक्रमित पशुओं का इलाज शुरू करना चाहिए।डॉ० कुमार मंगलम के अनुसार लंपी स्किन रोग के लिए परंपरागत उपचार व पशुओं के आश्रय की उचित साफ सफाई प्रबंधन की विधि बताई गई है. जिसमे गाय के संक्रमित होने पर अगर परंपरागत उपायों को भी कर लिया जाए तो काफी राहत मिल सकती है. हालांकि इस दौरान ध्‍यान रखें कि बीमारी पशु को स्‍वस्‍थ पशुओं से पूरी तरह दूर रखें. बीमार पशु के पास अन्‍य पशुओं को न जाने दें और न ही इसका जूठा पानी या चारा अन्‍य पशुओं को खाने दें.शुरुवाती के दिनों में गायों के आस-पास और उनके तबेले में नीम की पत्तियों का धुंआ करना चाहिए जिससे कीटों से मुक्त रहे और गायों को दिन में तीन बार फिटकरी के पानी से नहलाकर इसका स्प्रे भी तैयार किया जाना चाहिये, उनके स्किन या घाव पर मक्खी मच्छर न बैठने पाए पशु के आश्रय स्थल में कीटो पॉर काबू करने का खास ध्यान देना चाहिए एवं उस संक्रमण के इलाज के समान को खुले में नही रखना चाहिए एक संक्रमित पशु के देखभाल करने वाले व्यक्ति को अपने को साफ करके कपड़े बदलकर नहा कर ही अन्य किसी स्वस्थ्य पशु की देखभाल करेपशुशाला के साफ सफाई का उचित प्रबंध में फर्श दीवार को फिनायल 2 प्रतिशत या आयोडीन युक्त कीटनाशक 1.33 का उपयोग किया जाना चाहिए जैसा कि ज्ञात है कि कमजोर इम्‍यूनिटी वाली गायों को खासतौर पर यह वायरस प्रभावित करता है इसलिए खासतौर पर उनके आहार पर ध्यान देना चाहिए जिससे कि उनकी इम्युनिटी को बढ़ाया जा सके , संतुलित आहार,मिनरल मिक्चर, मल्टीविटामिन, घरेलू नुस्खे में काढ़ा बहुत जरूरी है साथ हर तीसरे दिन निम्बू 50ग्राम, बांध गोभी, दिया जा सकता है हल्दी, कालीमिर्च, आंवला का उपयोग भी किया जा सकता है।

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