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इतिहास के पन्नो में भी यह “दरारें” दर्ज रहेंगी !

बिहार चुनाव की सरगर्मियाँ धीरे-धीरे तापित होने लगी हैं । पहले चरण के चुनाव के लिए प्रत्याशियों के नामांकन का दौर चल रहा है । अभी भी गठबंधन में रोज़ जुड़ने और बिखरने का खेल चल रहा है। इसी बीच नामांकन रैलियों में राजनेताओं के बयान तो पूछिये मत ! हाल ही में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और उजियारपुर से सांसद नित्यानंद राय ने जनता दल (यूनाइटेड) के उम्मीदवार की नामांकन रैली में बयान दिया कि “यदि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बनती है तो कश्मीर में दुबके आतंकवाद और आतंकवादी बिहार की धरती पर पनाह लेंगे, और वे पनाह लेने नहीं देंगे”। 2015 के बिहार चुनाव में भी राजद-जदयू की जीत पर भी “पाकिस्तान में पटाखे फूटने” की बात कही गई थी । इस बार मामले को थोड़ा पीछे लाकर पाकिस्तान से कश्मीर में विराम दिया गया है।पिछले ही वर्ष दिल्ली का चुनाव हुआ, देश ने देखा कि एक तरफ़ शाहीनबाग़ में कई महीनों से सीएए-एनआरसी के विरोध में बैठी महिलायें, विधानसभा का चुनाव और राजनैतिक पार्टियों की ऊल – जलूल बयानबाज़ी । आख़िरकार, उन बयानों की गर्मी में दिल्ली झुलस कर रह गई । फिर बिहार चुनाव में इस तरह की बयानबाज़ी का क्या मतलब?देश कोरोना की महामारी के साथ भीषण बेरोज़गारी और आर्थिक संकटों के भँवर में फँसा है । पिछले छह महीनों से अधिक समय से स्कूल-कॉलेज, व्यवसायिक शिक्षा संस्थान, विभिन्न विश्वविद्यालय सब बंद हैं । ऐसे में करोड़ों बच्चों के भविष्य का कुछ पता नहीं है ? पलायन कर आये, मज़दूरों, कामगारों, युवाओं किसी के विस्थापन और रोज़गार की कोई योजना राज्य सरकार और सिस्टम के पास है नहीं? बाढ़ से ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा बिहार अब तक नहीं संभला, इसके लिए कोई योजना है नहीं? लेकिन, बिहार में सरकार बदलती है तो कश्मीर के आतंकवादी बिहार में पनाह लेंगे, यह कैसी दलील है ? ऐसे वो सभी लोग भी सवालों के घेरे में हैं जो लोग ऐसी रैलियों को अटेंड करते हैं और झूठ-मूठ का पूडी-सब्ज़ी खाकर, ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाकर ताली पिटते हुए अपने घर चले आते हैं । क्या उनके पास भी अपने राजनैतिक दलों से पूछने को एक भी सवाल नहीं होता या आम लोगों की ज़िंदगी में रोज़मर्रा की समस्यायों से वे अछूते होते हैं? जब सब “चंगा सी” फिर भी आतंकवादी आयेगा…क्या मतलब?बिहार में बाढ़ के मद्देनज़र आपदा घोषित की गई थी उसके कारण किसी की मौत होने की स्थिति में उसे राज्य सरकार द्वारा आर्थिक मदद दिया जाना था । वैशाली ज़िले के पटेढ़ी बेलसर प्रखंड के साइन ग्राम पंचायत के विनोद कुमार बताते हैं की उनके पड़ोस में रहने वाली 40-42 साल की महिला मंजु देवी को बाढ़ का पानी घर के पास तक होने के कारण किसी ज़हरीले साँप ने डँस लिया । उन्हें गम्भीर हालत में मुज़फ़्फ़रपुर स्थित शासकीय अस्पताल में भर्ती कराया गया । पति विदया महतो मज़दूरी करते हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण आस-पास के लोगों ने चंदा करके होस्पिटल के खर्च में परिवार को मदद करने का प्रयास भी किया, किंतु ज़हर अधिक फैल जाने के कारण तीन दिन बाद उस महिला की मृत्यु हो गई। परिवार के आर्थिक संकट को देखते हुए प्रखंड सीईओ से सम्पर्क किया गया लेकिन उन्होंने सर्पदंश को वन्य-जीव कहकर वन विभाग से मदद की बात बोल दी है और वन्य-विभाग ज़िला प्रशासन के लिए बोलता है। क्षेत्रीय लोगों द्वारा क्षेत्रीय विधायक एवं सांसद से भी सम्पर्क किया गया ताकि गरीब विदया महतो को कुछ आर्थिक मदद दी जा सके । लेकिन, उस गरीब परिवार के मदद में अबतक कोई हाथ आगे नहीं आया । फिर आतंकवादी आयेगा, ऐसे डराने का क्या मतलब?ऐसे ढेरों उदाहरण हैं बिहार सरकार और उसके प्रशासनिक व्यवस्था के ढीला-ढवाली का । लेकिन, चर्चा इस बात की आवश्यक है कि सरकार बदलेगी तो कहाँ के आंतंकवादी पनाह लेंगे ? क्यों लेंगे भाई? हाजीपुर वैशाली की पवित्र भूमि का ज़िला मुख्यालय है किंतु आज तक एक ढंग का होटल या गेस्ट हाउस न बन सका । हर वर्ष हज़ारों की संख्या में विदेशी पर्यटक वैशाली घूमने आते हैं । पूर्व मध्य रेल का मुख्यालय है । होटल मैंनेजमेंट का नैशनल कॉलेज है हाजीपुर में । मुश्किल से 3-4 किमी के दूरी पर एक समय एशिया के सबसे बड़े पशु मेला के लिए प्रसिद्ध हरिहरनाथ क्षेत्र मेला (सोनपुर मेला) और सोनपुर में रेल मंडल का कार्यालय है…किंतु न किसी जनप्रतिनिधि के पास इस क्षेत्र के विकास को लेकर कोई योजना है और ना ही किसी प्रशासनिक व्यवस्था के पास । ऐसे में भी आतंकवादी आयेगा! इसका क्या मतलब ?देश में अभी भी 40 प्रतिशत से अधिक आबादी के पास फ़ीचर फोन नहीं है, तो बिहार की स्थिति को समझना मुश्किल नहीं होगा? अभी भी अधिकतर गाँवों में लाइट की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है । लाइट है तो मोबाइल नेट्वर्क नहीं है । कभी बिहार जाओ तो मोबाइल को लग्गी में बांधकर तो नेट्वर्क खोजना पड़ती है, एक भी ऐसी कम्पनी का सिम न होगा जो मैंने ली न हो । लेकिन, नेट्वर्क आ जाए, सवाल ही नहीं उठता । शहर में अभिभावक अपने बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई की चिंता कर रहे हैं गावों में ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई की बेसिक समझ लोगों में नहीं है। कैसे हो रही होगी उन बच्चों की पढ़ाई जो बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं । सरकारी स्कूलों में परीक्षा को लेकर कोई तैयारी अब भी नहीं हैं-क्या बिहार सरकार शैक्षणिक सत्र-2020-21 को शून्य घोषित करेगी । 15 नवम्बर तक तो वैसे भी चुनाव आचार सहिंता के कारण सभी शासकीय शालायें चुनाव आयोग के हिरासत में ही रहेंगी । जब मोबाइल का नेट्वर्क ही नहीं, लोगों में स्मार्ट्नेस ही नहीं हैं तो फिर सीधे-साधे लोगों के बीच आतंकवादी आयेगा ! क्या मतलब ?

बिहार में कहीं स्कूल, कॉलेज हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं भी तो रिज़ल्ट समय पर नहीं मिलता । युवाओं के लिए नौकरी निकलती है, परीक्षा हुई तो दो साल तक उसका नतीजा नहीं, नतीजा निकलने के बाद उसके चयन में 1 साल का और यदि गलती से चयन हो गया तो उसके और 3 साल तक जोईनिंग नहीं । कैसा सिस्टम है ? किस बात की सजा दी जाती हैं ऐसे युवाओं को? हम मानते हैं की सरकार सभी को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती, लेकिन इतने वर्षों बाद भी एक इन्फ़्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं कर सके कि बड़ी संख्या में राज्य से पढ़े-लिखे युवाओं का एक बड़ा समूह पलायन करने को विवश न हो । न ये युवा इन ख़ामियों के ख़िलाफ़ खुद खड़े होते हैं न इनके लिये कोई खड़ा होने वाला शेष है। जहां युवाओं की स्थिति इतनी दयनीय है, वहाँ पर आतंकवाद आयेगा…का क्या मतलब?

जब विश्व “वर्ष 2000” को “मिलेनियम इयर” मना रहा था, उसके बाद भी कई वर्षों तक बिहार के पंचायत चुनाव में दबंगों द्वारा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को धता बताकर बूथ कैप्चरिंग कर मतपेटी उठाकर ले जाते थे और प्रत्याशी खुद से स्ट्रोंग रूम में मतपेटी को जमा करा आते थे । तब से अब में यही बदला कि अब राजनेता अपने बयानों को तीखा करके इलेक्ट्रानिक्ली बैलेट बॉक्स में डालने का प्रयास करते है। फिर भी आंतंकवादी आयेगा और हम आने नहीं देंगे…क्या मतलब?कोई तो आओ…बिहार को टटोलने का प्रयास करो, अपने आग़ोश में लेकर एक बार हलके से पूछो कि उन्हें क्या चाहिये । और कितना दंश झेलेगा और वह पवित्र भूमि जिसने इस यूनिवर्स को “0” शून्य दिया हो । क्यूँ इस तरह से चुनाव के समय आकर बार-बार अपने नापाक बयानों से उनके घावों को कुरेदने का प्रयास किया जाता है। जिस धरती ने अपने तमाम मुफ़लिसी के बावजूद अपनी शिक्षा, दीक्षा, आचार, विचार और व्यवहार के दम पर देश को सर्वाधिक शीर्षस्थ ब्यूरोकरैट्स दिए हो…राजनेता दिए हो…आज़ाद भारत का प्रथम राष्ट्रपति दिया हो – फिर कुछ तो बात रही होगी उस पवित्र धरती के सनातनी परम्परा में । लेकिन, फिर भी बिहार “बीमार” ही रह गया । किसी ने कोशिश ही नहीं की कभी पीछे देखने की । किसी गाँव को क्यूँ गर्व महसूस हो…क्या फ़र्क़ पड़ेगा की मेरे गाँव एक बच्चा इस देश का कैबिनेट सेक्रेटेरी है, किसी राज्य का चीफ़ सेक्रेटेरी है, किसी राज्य का डीजीपी है ? क्या मिलेगा उन लोगों को इसके बदले ? ऐसे लोगों के बीच भी आतंकवादी पनाह लेगा…क्या तुक है?नित्यानंद जी, हाजीपुर से लगातार कई बार के लोकप्रिय विधायक रहे है। बिहार भाजपा के जाने-माने नेताओं में उनकी साख है। बिहार भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं । 2014 के आम चुनाव में उनको उजियारपुर से टिकट मिला क्योंकि हाजीपुर संसदीय क्षेत्र आरक्षित सीट है। नित्यानंद राय वर्तमान में देश के गृह राज्य मंत्री का कार्यभार सम्भाल रहे हैं । लेकिन उनका इस तरह का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान उनके चाहने और उनसे नैतिकता की उम्मीद रखने वाले लोगों के दिल को ठेस पहुँचा सकता है । – सतीश साह

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