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सरकार की सही एवं गलत, हर बात में, हाँ में हाँ मिलाने तक ही आज की राजनीति सीमित होकर रह गई है! 

सत्यान्वेषी, सत्यनिष्ठ एवं सत्यवादी लोग सत्य को ईश्वर के समान पवित्र समझते हैं। यदि उनसे कोई त्रुटि हो जाए तो वे विनम्रता पूर्वक स्वीकार करते हैं। अपनी गलती को सही ठहराने की जिद करने वाले लोग जड़, मूर्ख एवं अहंकारी होते हैं। भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक, पूर्व वित्त एवं विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने जीएसटी को लेकर जो चिंता व्यक्त की है, उस चिंता को उनसे पूर्व भी सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कई अनुभवी नेता, अर्थशास्त्री एवं समाजशास्त्री व्यक्त कर चुके हैं किंतु यह देखकर हैरानी होती है कि यशवंत सिन्हा की बात पर गंभीर मंथन करने के पश्चात् ही कोई उत्तर देने के स्थान पर राजनाथ सिंह जैसे अनुभवी एवं स्वच्छ छवि वाले नेताओं ने यह कहने में विलम्ब नहीं किया कि देश की अर्थव्यस्था तेजी से पटरी पर दौड़ रही है। क्या अपनी सरकार की सही एवं गलत, हर बात में, हाँ में हाँ मिलाने तक ही आज की राजनीति सीमित होकर रह गई है!

जीएसटी को लागू हुए पर्याप्त समय हो चुका है और इसके अच्छे-बुरे पक्ष देश के सामने आने लगे हैं। कर-वंचकों को कर देने के लिए बाध्य करना एक अच्छी सरकार की जिम्मेदारी है, इस दृष्टि से जीएसटी एक अच्छा कदम कहा जा सकता है किंतु कर-वंचकों को घेरने के चक्कर में जब सरकार आम आदमी की रोजी-रोटी पर भी फंदा डाल दे तो उसे अच्छा कदम नहीं कहा जा सकता। जीएसटी की जटिलताएं आज भी देश के लाखों वकील और चार्टर्ड एकाउण्टेंट नहीं समझ पाए हैं, आम आदमी के लिए तो यह किसी मुसीबत से कम नहीं है। छोटे-छोटे कारोबरी आज भी जीएसटी में पंजीकरण कराने, मासिक-त्रैमासिक विवरणियां भरने और पैनल्टियों से बचने में अपने आप को फंसा हुआ पाते हैं और स्वयं को अपमानित एवं ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। कुछ व्यापारी तो दम घुटने जैसी स्थिति में हैं। क्या किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए जनता के बीच ऐसी स्थितियां पैदा कर देना समझदारी का काम कहा जा सकता है!

सरकार की एजेंसियों में यदि सत्य को सुनने, समझने और कहने की शक्ति है तो वे सोशल मीडिया को उठाकर देख लें, चारों तरफ जीएसटी की जटिलताओं की चर्चा है, लोगों के काम-धंधे मंद पड़ने की चर्चा है और नवीन रोजगारों के अवसर घटने की चर्चा है। सरकार की एजेंसियों के लिए कुतर्क करने के लिए पर्याप्त कारण है कि जीएसटी के बाद लेखाकारों एवं वकीलों के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए हैं किंतु उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि वकीलों और लेखाकारों की हर माह मोटी फीसें कौन चुकाएगा!
क्या वित्त मंत्री अरुण जेटली जीएसटी का सरल और कॉमनमैन फ्रैण्डली विकल्प देने का नैतिक साहस दिखा सकते हैं! क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिनकी छवि जनता से कर वसूलने वाले कठोर शासक की बनती जा रही है, करों की दरें कम करने तथा लाखों करोड़ रुपए से बनने वाली बुलेट ट्रेन के फैसले पर दुबारा से विचार करने का नैतिक साहस दिखा सकते हैं!
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में अपनी ही पीठ ठोकते नहीं थकते कि वे जनता के हित में कठोर फैसले ले रहे हैं किंतु कभी जनता के मुंह से सच्चाई सुनने की हिम्मत तो दिखाएं। ईमानदारी की बात यह है कि जनता अपनी बैंक जमाओं पर ब्याज दर घटने, जिन चीजों पर पहले कर नहीं लगता था, उन पर भी कर लगने, रेलवे और वायुयान के किराए बढ़ने, पैट्रोल-डीजल के भाव बढ़ने, महंगाई बढ़ने, जीएसटी की जटिलताओं के कारण काम-धंधे में नई कठिनाइयों के उत्पन्न होने से तंग है। कहीं ऐसा न हो कि प्रधानमंत्री अपनी तारीफ करते ही रह जाएं, उनके मंत्री उनकी हाँ में हाँ मिलाते रह जाएं और जनमत भारतीय जनता पार्टी के हाथ से खिसक कर किन्हीं और हाथों में चला जाए। यह ठीक वैसा ही होगा जैसा कि सोनिया गांधी और उनकी पार्टी चारों तरफ से हो रही आलोचनाओं की अनसुनी करके 2014 के चुनावों में कुर्सी से उतर कर धरती पर आ गईं और जनता ने उन्हें सच्चाई से अच्छी तरह परिचय करा दिया।
जीएसटी को लेकर देश में जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में इस कहावत का स्मरण करना अनुचित नहीं होगा कि जब रोम जल रहा था, तब नीरो वीणा बजा रहा था। शेक्सपीयर के सुप्रसिद्ध नाटक जूलियस सीजर की एक पंक्ति है, यदि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सुनी हो तो इस पर समय रहते अमल कर लें और न सुनी हो तो सुन कर अमल कर लें- जूलियस सीजर की पत्नी को पवित्र होना ही जरूरी नहीं है, उसे पवित्र दिखना भी जरूरी है। अर्थात् इतना कह देना भर पर्याप्त नहीं है कि देश की अर्थव्यस्था तेजी से दौड़ रही है, ऐसा होते हुए दिखना भी जरूरी है।
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