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विपक्ष को 2019 के लिए नेता की तलाश

भारत में आज विपक्ष हताश है, देश में सन् 1984 में चली स्व. इंदिरा गांधी की सहानुभूति लहर में जब विपक्ष का सफाया हो गया था और भारतीय जनता पार्टी को मात्र 2 सीटें प्राप्त हुई थीं, तब भी विपक्ष इतना हताश नहीं हुआ था जितना आज है, जब विपक्ष परास्त हुआ था आज जैसा हताश नहीं। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को परास्त करने के लिए आज हताश विपक्ष भले ही एकजुट हो, मगर उसके पास नेतृत्व नहीं है जिसे मोदी या भाजपा के सामने उतारा जा सके। यानी विपक्ष अपने दूल्हे की तलाश में है, सेहरा तैयार है, घोड़ी बैंडबाजा बाराती तैयार हैं पर दूल्हा ही नहीं मिल रहा।

 

आज देश की परिस्थितियां बदली हैं, जो परिस्थितियां कभी कांग्रेस के पक्ष में थीं, आज भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। देश के 18 राज्यों में राजग की सरकार है। देश के उन राज्यों में जहां भारतीय जनता पार्टी का कोई नाम लेवा नहीं था वहां भी आज इसी पार्टी का राज है। ख़ास कर दक्षिण भारत और नार्थ ईस्ट में। कुल जमा हालत ये है कि आज भारतीय जनता पार्टी ने अपने आप को देश का उत्तराधिकारी बना दिया है और जिस हालत में विपक्ष है उससे तो आगामी सालों में भी उसे (भाजपा) दरकिनार किया जा सकेगा ऐसा लगता नहीं।
देश में सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने के बाद जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष को एकजुट होना पड़ा था उस समय सभी दल इंदिरा गांधी के खिलाफ थे। जयप्रकाश नारायण एक विचारधारा थे, राजनेता नहीं थे, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्र शेखर जैसे दिग्गजों के साथ मार्क्सवादी, सोशलिस्ट, जनसंघ सहित अनेक दल उनके साथ चले और 1977 में कांग्रेस का साम्राज्य ढहा था।
आज देश में विपक्ष के पास खासकर कांग्रेस या किसी भी दल के पास कोई नेतृत्व नहीं है, जिसकी अगुवाई में बाकी राजनेता या दल एकत्र हो सकें। भाजपा और संघ परिवार पर वार करने लिए कोई  धारधार हथियार इनके पास है ही नहीं! लेकिन सब ये जानते भी हैं कि भाजपा को अब हरा पाना इनके बूते, तब तक नहीं है जब तक की ये एक न हो जायें क्योंकि, अब इन दलों के सामने अपने अस्तित्व का खतरा भी है। गौर करने की बात ये है आखिर विपक्ष में ऐसा कौन है जो इतना सक्षम या समर्थ है जो बाकी नेताओं को एकजुट कर सके। यानी विपक्ष की बारात तो तैयार है और दूल्हा अभी ढूंढा जा रहा है। हिन्दी राज्यों से शुरुआत करें तो बात उत्तर प्रदेश की। उत्तर प्रदेश में हालिया विधानसभा चुनाव से पहले युवा नेतृत्व के नाम पर अखिलेश यादव में वो दूल्हा तलाशने की कोशिश  विपक्ष द्वारा की गयी थी। कांग्रेस से गठजोड़ कर ये जताया भी गया कि अब युवाओं का दौर आयेगा। मगर बिहार की तरह यहाँ भाजपा को हराया नहीं जा सका और अखिलेश दरकिनार हो गए!  मायावती सबको स्वीकार नही होंगी और वे उत्तर प्रदेश से बाहर स्वीकार्य नहीं हैं।
बिहार में नितीश कुमार के भाजपा से हाथ मिला लेने के बाद नीतीश के नेतृत्व की सम्भावना जो बन रही थी वह धाराशाई हो गयी, यानी जिसे दूल्हा बनाने की बात की जा रही थी वही जा कर दुल्हन से राखी बंधवा आया। लालू प्रसाद खुद आरोप से घिरे हैं और वे देश के पहले ऐसे राजनेता होंगे जिन्हें अदालत ने चुनाव लड़ने से रोका है, दागी नेता के नाम पर और अपने राज्य से बाहर न निकल पाना उन्हें भी इस दौड़ से बाहर कर देता है। उनके युवा बेटे तेजस्वी का आभा मंडल ऐसा नहीं है कि सेहरा उनके माथे बंधा जा सके। उडीसा में नवीन पटनायक तटस्थ रहे हैं, कम्युनिस्टों में सीताराम येचुरी को खुद उनकी पार्टी ने तीसरी बार राज्य सभा नहीं भेजा। सोमनाथ चटर्जी अब राजनीति से ही बहर हैं, ममता बनर्जी अपने बंगाल से बाहर नहीं आ पा रहीं, सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस खुद नेतृत्व विहीन है, जो नेता बचे हैं वो सोनिया गाँधी की छाया से बाहर नहीं आ रहे हैं, राहुल गांधी अपने आप को पार्टी का ही उत्तराधिकारी नहीं बना पाए और विपक्षी नेताओं के सामने वे आज भे नौसिखिए ही माने जाते हैं, फिर आखिर भाजपा के विरोध में एका कैसे हो, यही कारण है कि अब सांझी विरासत के नाम से बिहार में जदयू के महागठबंधन छोड़ भाजपा से हाथ मिलाने का मुखर विरोध कर रहे शरद यादव के  आगे आते ही समूचा विपक्ष उनके सर पर सेहरा बंधने को तैयार दिखा।
मगर शरद यादव ने सांझी विरासत का हवाला दिया। इंदौर में दूसरे संस्करण में आठ ग़ैर भाजपाई दलों ने एकजुटता दिखाते हुए नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोला। इन दलों ने आरोप लगाया कि देश में संविधान के तहत मिले बुनियादी अधिकारों और विविधता में एकता की राष्ट्रीय भावना पर खतरा मंडरा रहा है। देश में भय और डर का माहौल पैदा करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि यह दौर इमरजेंसी का भी बाप है।
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