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घुटने के दर्द का कारण सिर्फ बढ़ती उम्र ही नहीं

आज के समय में घुटने का दर्द एक आम समस्या बनती जा रही है। आपके आसपास भी ऐसे बहुत से लोग होंगे, जो अक्सर घुटने में दर्द की शिकायत करते होंगे। वास्तव में यही वह अंग है जो हमारे शरीर का बोझ उठाता है, इसलिए घुटने के जोड़ में दर्द काफी कष्टकारी होता है।

 

तीन हडि्डयां मिलकर घुटने का जोड़ बनाती हैं। टांग की हड्डी को टिबीआ तथा जांघ की हड्डी को फ्यूमर कहते हैं, इनमें जुड़ती है घुटने की पाली जिसे पेटला कहते हैं। हल्के से झटके या दबाव से हडि्डयों को टूटने से बचाने के लिए घुटने के जोड़ में उपस्थित लिगामेंट तथा मेनीसकस शॉक आबसरवर की तरह काम करते हैं। घुटने के जोड़ को स्थिरता प्रदान करने का काम लिगामेंट करता है जबकि मेनीसकस स्नेहक के रूप में कार्य करता है अर्थात जोड़ को घिसने से बचाता है।
अनेक ऐसे लक्षण हैं जिससे घुटने के जोड़ की खराबी का पता चलता है। जैसे घुटने के जोड़ों में हमेशा दर्द रहना। कई बार दर्द इतना बढ़ जाता है कि साधारण काम जैसे उठने, बैठने, चलने−फिरने से भी घुटने में काफी दर्द होता है। साथ ही पद्मासन लगाने अथवा पालथी में बैठना भी मुश्किल होता है। लंगड़ा कर चलना, गतिशीलता में कमी आना, जोड़ का टेढ़ा होना आदि इसके अन्य लक्षण हैं। कुछ मामलों में जोड़ों में संक्रमण के कारण उनमें सूजन भी आ जाती है।
घुटने के जोड़ की गतिशीलता में कमी के कई कारण हो सकते हैं साथ ही कई बार बढ़ती उम्र के साथ−साथ इन जोड़ों में घिसने की प्रवृत्ति भी पाई जाती है। होता यह है बढ़ती उम्र के साथ इन जोड़ों में विकृति आ जाती है। कई बार जोड़ के पास की हड्डी घिसने या टूटने से भी जोड़ प्रभावित होते हैं। यदि लिगामेंट अथवा मेनीसकस फट जाते हैं तो भी जोड़ में अस्थिरता आ जाती है, इससे रोगी को सदैव घुटने में दर्द महसूस होता रहता है। उसे चलने−फिरने यहां तक कि हिलने−डुलने में भी असुविधा महसूस होती है। उम्र−दराज लोगों में अक्सर जोड़ों के आर्टिकार्टिलेज घिस जाने से भी यह रोग हो जाता है। अत्यधिक मोटापे तथा मेहनत न करने के कारण भी यह रोग हो जाता है क्योंकि प्रायः ऐसे लोगों में पाचन तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र तथा मांसपेशियां ठीक नहीं रहतीं। जोड़ों में किसी प्रकार के कीटाणु भी यह समस्या पैदा कर देते हैं। फास्फोरस की कमी से भी जोड़ों में दर्द हो जाता है क्योंकि फास्फोरस की कमी से जोड़ों में स्नेहन तत्व भी कम होने लगता है। मानसिक तनाव, चिंता, उदासी व आघात भी घुटने के जोड़ों में दर्द उत्पन्न कर सकता है।
रोग के शुरुआती दौर में भाप, मोम स्नान, फिजियो थैरेपी तथा दर्द निवारक दवाओं से ही आराम मिल जाता है। किस रोगी के लिए किस प्रकार की विधि उपयुक्त है, इसका निर्णय तो रोगी की ठीक प्रकार से जांच करके ही लिया जा सकता है। युवा खिलाड़ियों में ज्यादातर की इस प्रकार जांच की जाती है। युवा खिलाड़ियों में ज्यादातर लिगामेंट क्षतिग्रस्त होते हैं। जिसे सूक्ष्मयंत्र द्वारा बिना किसी चीरफाड़ के जांचा जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर छोटी सी शल्य क्रिया से इस समस्या से छुटकारा मिल जाता है।
कई बार जोड़ों की समस्या ज्यादा उग्र हो जाती है जैसे जोड़ पूरी तरह घिस जाते हैं, मेनीसकस व लिगामेंट फटने से जोड़ अस्थिर हो जाते हैं, ऐसे में कृत्रिम जोड का प्रत्यारोपण आवश्यक हो जाता है। कृत्रिम जोड़ के इस प्रत्यारोपण को टोटल नी रिप्लेसमेंट कहते हैं। कृत्रिम जोड़ों के निर्माण के लिए स्टील, कोबाल्ट व क्रोमियम को मिलाकर बनी मिश्र धातु का प्रयोग किया जाता है।
प्रायः लोगों की यह धारणा होती है कि प्रत्यारोपण की तकनीक न तो सुरक्षित है और न ही कारगर। इसलिए वे इस उपचार को अपनाने से डरते हैं। दूसरी ओर यह विधि पूरी तरह सुरक्षित व सफल है। इसकी सफलता की दर लगभग 98 प्रतिशत है। केवल दो प्रतिशत मरीज ही ऐसे होते हैं जिनकी समस्या का निदान इस तकनीक से नहीं हो पाता। बाकी सभी मरीजों में इस तकनीक से न केवल दर्द का निदान होता है अपितु उनकी गतिशीलता भी सामान्य हो जाती है। यदि घुटने के इन जोड़ों का प्रयोग ठीक ढंग से सावधानीपूर्वक किया जाए तो ये बीस पच्चीस साल आराम से काम देते हैं। दूसरी ओर चूंकि घुटने के प्रत्यारोपण की चिकित्सा कोई सामान्य चिकित्सा नहीं है इसलिए प्रत्यारोपण से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि जहां आप ऑपरेशन करवा रहें हों वहां प्रशिक्षित डॉक्टर, अनुकूल आपरेशन थियेटर, जांच के विश्लेषण तथा फिजियो थैरेपी के आधुनिक उपकरण उपलब्ध हों। एक बार घुटने का प्रत्यारोपण हो जाए तो उसका प्रयोग सोच समझ कर करना जरूरी है।
प्रत्यारोपण के बाद कूदने, भागने, दौड़ लगाने पर कुछ बंदिशें हो सकती हैं। पश्चिमी ढंग से बने शौचालय का प्रयोग करें साथ ही मोटापे तथा उत्तेजक पदार्थों का प्रयोग इस समस्या को और बढ़ा सकता है इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों का प्रयोग भी सोच समझ कर करें।
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